मिथिला के प्रतीक आ शान – पान,मखान, माछ आ पाग

पान

पान के पेशकश मिथिला में सम्मान के प्रतीक होइत ऐच्छ। दरभंगा के पान कोलकाता के पान बजार में एकटा विशेष स्थान रखइत ऐच्छ। गत कतेक वर्ष में मिथिला में पान के खेती में बहुत गिरावट आइल ऐच्छ। मिथिला में चौरसिया समुदाय के लोक जादा पान के खेती करैत छैथ, मिथिला में पान के बिना कोनो भी शुभ कार्य के पूरा नहीं कैल जाईत ऐच्छ। ई विवाह अनुष्ठान सब में सेहो इस्तेमाल होईत ऐच्छ और भैया दूज जैहेन त्योहार में सेहो। अपन मिथिला में अतिथि के स्वागत सेहो एकटा पान स कैल जाइत ऐच्छ।

मखान
मखान मिथिला में पानी के भंडार के कारण लोकप्रिय ऐच्छ व एकर बहुत रास सांस्कृतिक कार्य मे सेहो बहुत महत्व ऐच्छ।गत किछ साल में मखान के मांग नई केवल अपन देश परन्तु विदेश में सेहो वृद्धि भेल ऐच्छ।ई एकतरहक स्नैक फूड सेहो ऐच्छ जे लोकप्रिय ऐच्छ कियाकि अहि में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, मैग्नीशियम, पोटेशियम, फास्फोरस, लोहा व जिंक सब प्रचुर मात्रा में पायल जाइत ऐच्छ ।मैथिली और हिंदी के लोकप्रिय कवि आचार्य सोमदेव ऐना मिथिला के वर्णित केला ह – “पग-पग पोखर माछ मखान, सरस मधुर मुस्की मुख पान” जेकर अर्थ ऐच्छ “एक जगह जहाँ अपने के हर कदम पर माछ, मखान और पोखैर भेट जायत और जहाँ पान चबाबैत मुस्कुराइत चेहरा अपने के स्वागत करत ऊहे मिथिला ऐच्छ और अहि के लेल मिथिला जानल जाइत ऐच्छ।”

माछ
मिथिला में माछ के एकटा सांस्कृतिक महत्व भेटैत ऐच्छ। ऐता यात्रा शुरू करे के समय माछ देखनाइ शुभ मानल जाईत ऐच्छ। मिथिला पेंटिंग्स में सेहो एकरा महत्व देल जाईत ऐच्छ। मिथिला में लोक सब के भात के संग माछ बहुत पसंद होइत ऐच्छ। किछ विशिष्ट माछ के किस्म मिथिला मे – बुआरी, नैनी, कटली, भाकुर, रोहू, कबई, पोथिया, सिंह , मंगूर, गैन्ची, झिंगा और मरा। खाध पारखी सब के मिथिला के माछ व अन्य प्रान्त के माछ के बीच बहुत अंतर देखाइत ऐच्छ। आब, बिहार के राज्य सरकार स्थानीय मछुआरा सबके संरक्षण देई पर सेहो गंभीरता स योजना बना रहल ऐच्छ।

पाग
पाग के मिथिला में विशेष महत्व ऐच्छ,पाग के मिथिला के संस्कृति के प्रतीक मानल जाइत ऐच्छ।
२-३ दसक पूर्व ब्राह्मण व कायस्थ मुख्यरूपेन पाग पहिरैत छेलाह,किन्तु समय के बदलाव में पाग के पहचान हेरायल बुझअ में आबैत ऐच्छ।
अखनो विवाह के समय दूल्हा पाग पहिरैत छैथ।
किनका कोन पाग पहिरबाक चाही सेहो पहिले स निर्धारित ऐच्छ जेना की यग्योपवीत के काल मे लड़का के लाल पाग पहिरबाक चाही और अन्य लोक व अतिथि के उज्जर पाग।
प्रख्यात कवि विद्यापति जी के छवि में हुनकर माथा पर पाग सुसज्जित देखबा में आबैत ऐच्छ।

अंततः (मिथिला के प्रतीक पान, मखान,माछ व पाग)
जय मिथिला।

:-अमित मिश्रा

मैथिली भाषा~Maithili language

जहा तक मैंने पढ़ा,बोला व जाना है
मैथिली कोई बोली नही बल्कि एक सक्षम भाषा है, क्योंकि इसके पास अपना लिपि व व्याकरण व सहित्य की भंडार है।

लिपि:
पहले इसे मिथिलाक्षर तथा कैथी लिपि में लिखा जाता था जो बांग्ला और असमिया लिपियों से मिलती थी पर कालान्तर में देवनागरी का प्रयोग होने लगा। मिथिलाक्षर को तिरहुता या वैदेही लिपी के नाम से भी जाना जाता है। यह असमिया, बांगला व उड़िया लिपियों की जननी है। उड़िया लिपी बाद में द्रविड़ भाषाओं के सम्पर्क के कारण परिवर्तित हुई।

इतिहास:
और इसके इतिहास के लिए क्या बोले इसका प्रमाण तो रामायण में मिलता है जहाँ राजा जनक की ये राज्यभाषा थी।
और लगभग 800ई के आसपास ही इसमें रचनाए की जाने लगी।

साहित्य:
14-15वी सताब्दी के महान कवि विद्यापति को मैथिली साहित्य में सबसे ऊंचा दर्जा प्राप्त है।

स्थिति:
भारत की साहित्य अकादमी द्वारा मैथिली को साहित्यिक भाषा का दर्जा पंडित नेहरू के समय १९६५ से हासिल है। २२ दिसंबर २००३ को भारत सरकार द्वारा मैथिली को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में भी शामिल किया गया है और नेपाल सरकार द्वारा मैथिली को नेपाल में दूसरे स्थान में रखा गया है।

:-अमित मिश्रा

रेफरेन्स(स्वयं बुद्धि,गूगल बाबा व मेरे बाबा)

गाम मौन परई यै(मैथिली कविता)

“गाम मौन परई यै”

बाबा-दाई के बखान मौन परई यै,
घर-क अंगना-दलान मौन परई यै।
“हमर गाम हमरा खूब मौन परई यै।”

अपन कलम-क आम मौन परई यै,
बारी के लताम मौन परई यै।
“हमर गाम हमरा खूब मौन परई यै।”

होली के ओ हुरदंग मौन परई यै,
ओइ हुरदंग के दबंग मौन परई यै
भांग पिब क सभक ओ ठिठोली मौन परई यै।
“हमर गाम हमरा खूब मौन परई यै।”

दुर्गा पूजा के मेला मौन परई यै,
ओहि ठम लागल ठेला मौन परई यै।
माँ-दाई के पूजा मौन परई यै,
आ पूजा देखअ आयल बगल-क टोल के पूजा मौन परई यै।
“हमर गाम हमरा खूब मौन परई यै।”

दीपावली के दिप मौन परई यै,
ओहि दीवाली में संगी-मीत मौन परई यै।
फुलझड़ी के इयोत आ फटक्का के अवाज मौन परई यै,
आ ओहि बचपन मे कैल गेल बेतुकक काज मौन परई यै।
“हमर गाम हमरा खूब मौन परई यै।”

छठी मैया के अर्घ मौन परई यै,
घाट पर कैल गेल बत-कही मौन परई यै।
“हमर गाम हमरा खूब मौन परई यै।”

तिला-संकरैतक तिल आ लाई मौन परई यै,
जतेक डुबकी लगायब ओतेक तिलबा भेटत ई बात मौन परई यै।
“हमर गाम हमरा खूब मौन परई यै।”

भोज-क ओ सकरौरी मौन परई यै,
दाई के हाथक तिलौरी मौन परई यै।
“हमर गाम हमरा खूब मौन परई यै।”

बजरंगबली के रोट मौन परई यै,
गाछ पर स गिरबा के चोट मौन परई यै।
मधुश्रावणी के फूल मौन परई यै,
बियाहल संगे कुमारी सब के टोली मौन परई यै।
“हमर गाम हमर मिथिला हमरा खूब मौन परई यै।”

:-अमित मिश्रा

आत्मचिंतन~Introspection

‘आत्मचिंतन’
(आजकल के समय,रिश्तों में इसकी आवश्यकता… )
आत्मचिंतन का अर्थ होता है स्वयं के भीतर शोध।

आज के समय मे सब व्यस्त है जिसके कारण लोग अपने आपको व अपनो को समय नही दे पाते और इसी कारण वे कही न कही उन खुशियों के क्षण को जी नही पाते जिन्हें वो जी सकते है,मैं भी नही जी पाता।
और यदि कभी हम अपनो के लिए समय निकाल भी लेते है तो कुछ न कुछ उन समय के व्यतीत होते वक़्त गलतफहमियां हो जाती है ,जिनका अस्तित्व तो सच्चाई मे कुछ नही होता लेकिन इक्तेफाक से वो एक विशाल रूप ले लेता है।और ये चीज अक्सर हर रिश्ते में आजकल देखने को मिल रहा है ,मैंने भी अनुभव किया है।
इसका मुख्य कारण होता है हमेशा इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में व्यस्त रहना, काम-काज का तनाव व अपने या अपनो के ऊपर समय व्यतीत न कर पाना और इसके बाद यदि हम थोड़ा समय निकाल भी लेते है तो हम बस ये चाहते है कि वो पूरा समय बस हमारा हो और जिसके कारण छोटी-मोटी बातें भी बड़ा रूप ले लेती है।

और तब जरूरत पड़ती है ‘आत्मचिंतन’ की क्योंकि गलत और कुछ नही बस समयानुसार खुद को ना समझना होता है ,समय कभी रुकता नही हमेशा बदलते रहता है तदानुसार हमे भी स्वयं का चिंतन करके स्वयं में बदलाव लाना चाहिए और फिर आप समय के साथ तो सब आपके साथ।
मैं तो कर रहा हूँ खुद पे शोध आप भी करिये ये कठिन बड़ा होता है क्योंकि इससे हमें खुद की कमियां,खामियां और भी सब नजर आ जाती है,लेकिन यकीन मानिये ‘आत्मचिंतन’ आपको एक जरिया के रूप में नजर आएगा जो आपको और बेहतर बनाते जाएगा।
और मेरा मानना है”चिंता चिता समान होता है और चिंतन सूर्य समान” अथार्त:आप चिंता करके कुछ नही कर सकते परंतु चिंतन करके आप सूर्य के समान उज्जवलित हो सकते है जिसमे कमिया तो जरूर होंगी लेकिन खूबी की चमक बहुत ज्यादा होगी….

:-अमित मिश्रा

Amit mishra

अक्सर लोगो को ये सवाल करते पाया मैने की तुम/आप बदल गए।
तो मेरा भी उनसे प्रतिउत्तर में कोई जवाब के बदले बस 3 सवाल ही होता है कि…
1)क्या समय वैसा ही है?
2)क्या हमारे परस्थितियां वैसे ही है?
3)क्या आप वैसे ही है?

और यकीन मानिये 95% लोगो के पास इसके बाद न कोई सवाल होता है ना जवाब…

:-अमित मिश्रा

Amit mishra

बेवकूफ है वो लोग जो कहते है इश्क़ और जंग में सब जायज है,क्योंकि अगर ऐसा है तो इश्क़ का नाम लेके जो लकड़ियों के साथ गलत किया जाता है वो भी जायज है और जंग का नाम लेके जो नागरिकों और जवानों के साथ किया जाता है वो भी जायज है।
ये दोनों ही चीज़ें अगर इंसानियत के दायरे में किया जाए तो इतिहास बनती है नही तो सर्वनाश का कारण…
:-अमित मिश्रा

Amit mishra

सुना था इंसान में इंसानियत होना बहुत जरूरी होता है, लेकिन आजकल के समय में ना ही कोई इंसान नजर आता है और नियत का क्या कहे वो तो जग जाहिर है।
:-अमित मिश्रा

Amit mishra

इस दुनिया मे उम्मीद सिर्फ खुद से करना चाहिए।खुद से करोगे तो निखर जाओगे और दूसरों से करोगे तो बिखर जाओगे।
:-अमित मिश्रा

Amit mishra

भरोसा खुद पे करना चाहिए ,क्योंकि दूसरों के कंधों पर केवल जनाजे निकलते है जिंदगी नही निकलती।
:-अमित मिश्रा

Amit mishra

भींगना चाहिए बारिश में, क्या पता जरूरत थी मन धोने की और हम रोज तन धोने के भ्रम में हो।
:-अमित मिश्रा