Mumbai bandra protest

ये भयावह तस्वीर मुम्बई के बांद्रा स्टेशन के पास की है।
जहाँ आज शाम हजारों लोग जुट गए।
जिनको अंततः लाठीचार्ज करके हटाया गया।
ये भीड़ इस महामारी corona और lockdown के समय नैतिक तो बिल्कुल नही लेकिन क्या कोई राजनेता,नेता,या विभिन्न पार्टियों के कार्यकर्ता इस मसले पर इन जैसे लोगों की समस्या जान कर अपने नैतिक होने का फर्ज पूरा करेंगे?
क्योंकि ये तस्वीर सवाल तो बहुत छोड़ गई है केंद्र व राज्य दोनों सरकारों के लिए।


:- अमित मिश्रा

होली (एक लड़की की आपबीती)

होली यह नाम सुनते ही सबके मन में रंग,खुशहाली और हर्षोल्लास का भाव आ जाता है,लेकिन मेरे लिए होली बेरंग,जोर – जबरदस्ती,और मन को ठेस पहुंचाने का बहाना नजर आता है।

जिसके पीछे का कारण है हमारा समाज,वहीं समाज जिसने बस इस त्योहार को रंग और खुशी से अलग ले जाके बस नशा और जबरदस्ती का त्योहार बना दिया है।

मैं भी अपने साथ हुई एक घटना को आप सबके सामने रखना चाहूंगी,पहले तो मैं घबरा रही थी लेकिन जैसे ही मैंने ये बात कुछ दिन पहले अमित मिश्रा को बताई की उन्होंने कहा कि आपको अपना बात सबके सम्मुख रखना चाहिए जिससे सभी लड़कियों उनके मां बाप और समाज को समझ आए और आपका भी मन हल्का हो कुछ तो इस बोझ से।फिर भी मैं हिचकिचाई लेकिन फिर मैंने हिम्मत की और हमने निर्णय लिया कि हम बिना नाम उजागर किए अपनी बात रखेंगे।

आज से बहुत साल पहले जब मैं छठी – सातवीं कक्षा में थी तो हर साल की तरह उस साल भी “होली” आई लेकिन मुझे क्या पता था की इस होली के बाद मेरा इस त्योहार को लेके धारणा ही बदल जाएगी।मेरे एक जीजू जो कि बाहर से बस “होली” खेलने आए थे ,उन्होंने मुझे भी बुलाया लेकिन मुझे बचपन से ही पसंद नहीं इसलिए मैंने बोला की मुझे रंग अच्छा नहीं लगता तो उन्होंने जिद्द किया जिसे देख मेरी मम्मी भी बोली की जीजू है मजाक का रिश्ता है जा खेल ले थोड़ा।मैं जैसे ही उनके पास गई की उन्होंने पहले चेहरे पे बहुत अच्छे से रंग लगाया लेकिन बस अगले 5 सेकंड मेरी जिंदगी के सबसे बुरे 5 सेकंड होने वाले थे ,उन्होंने क्या किया होगा ये आप सब समझ सकते है क्योंकि मैं वो नहीं लिख पाऊंगी और उसके बाद वो खूब हसे और मानो उनके आंखों में खुशी की लहर थी कि उन्होंने मर्द होने का सबूत दिया हो।मैं जब तक कुछ समझ पाती उन्होंने वो घिनौनी हरकत कर दी थी फिर मैं उन्हें धक्का देकर अपने कमरे में जाके खूब रोने लगी क्योंकि उन्होंने क्या सोचा ये मुझे नहीं पता था लेकिन मुझे अच्छा नहीं लग रहा था और लग रहा था कि मेरे साथ कुछ तो गलत हुआ है।

मां ने जब रोते देखा तो वो परेशान होके आई पूछने और जब मैंने उन्हें बताई की जीजू ने मुझे गलत तरीके और गलत जगह रंग लगाया तो वो भी रोने लगी और बोली कि क्या करेगी हमारे समाज में लड़कियों और औरतों को ये सब सेहना पड़ता है।उन्होंने मुझे ये तो केह दिया लेकिन कोई मां खुद सब बर्दास्त के सकती है लेकिन अपने बच्चो के ऊपर कुछ बर्दास्त नहीं कर सकती,उन्होंने पापा को बताया और फिर दोनों ने मिलकर जीजू को बस समझाया और विदा कर दिया।

शायद सब धीरे धीरे ये बात भूल गए होंगे लेकिन जब मैं बड़ी हुई तो समझा कि जीजू ने वो हरकत क्या सोच के की होगी और ये सोच सोच के ही मैं कई बार रोती हूं कि काश वो 5 सेकंड मेरी जिंदगी में ना आए होते और बाकी का निर्णय मैं आप सब से ही जानना चाहूंगी कि आपको क्या बोलना या करना चाहिए ऐसे बातों पे और यही कहते हुए मैं अपनी बात ख़त्म करती हूं।

आपलोगों ने ऊपर एक लड़की की आप बीती पढ़ी। मैं उस लड़की का नाम नहीं लिखूंगा क्योंकि इससे उनके जिंदगी में असर पड़ सकता है।लेकिन सबसे पहले हमेशा को तरह मैं होली पे कुछ बोलना चाहूंगा फिर इस आप बीती पर भी अपना बात रखूंगा

हिरण्यकश्यप की योजना प्रहलाद को जलाने की थी,क्योंकि वो हरी भगवान विष्णु का भक्त था और हिरण्यकश्यप भगवान हरी को अपना शत्रु मानता था। लेकिन उनकी योजना सफल नहीं हो सकी क्योंकि प्रहलाद सारा समय भगवान विष्णु का नाम लेता रहा और बच गया पर होलिका जलकर राख हो गई। होलिका की ये हार बुराई के नष्ट होने का प्रतीक है। इसके बाद भगवान विष्णु ने हिरण्यकश्यप का वध कर दिया, इसलिए होली का त्योहार, होलिका की मौत की कहानी से जुड़ा हुआ है। इसके चलते भारत के कुछ राज्यों में होली से एक दिन पहले बुराई के अंत के प्रतीक के तौर पर होली जलाई जाती है। और होली में रंग भगवान कृष्ण के समय जुड़ा ऐसा माना जाता है माना जाता है कि भगवान कृष्ण रंगों से होली मनाते थे, इसलिए होली का त्योहार रंगों के रूप में लोकप्रिय हुआ।

अब आते है आज के समय की होली पे,तो इसमें मुझे भी बस नशा,जबरदस्ती,अपने मन की संतुष्टी करना,और सीधे शब्दों में कहूं तो नियोजित तरीके से “होली” का बहाना लेके छेरछार करना।मेरा सवाल बस इस समाज से ये है कि क्या वो लोग जो मजाक का रिश्ता या “होली” का नाम लेके जो दूसरे औरतों के साथ करते है क्या वो खुद के घर भी वही सब बर्दाश्त करेंगे??क्या उस लड़की के मां बाप को उस समय कड़ा रुख नहीं अपनाना चाहिए था क्योंकि वो घर का जमाई था तो कुछ भी करे??उस लड़की पे क्या बीत रही होगी जिसे उस समय कुछ ज्यादा समझ भी नहीं थी??और जब उसे समझ हुआ तो क्या वो 5 सेकंड उसके जीवन भर उसे नहीं परेशान करेगा??

सवाल तो बहुत है लेकिन ना ही मैं उसे जवाब दे पाया ना ही आप लोग उस लड़की या ऐसी कई लड़कियों या औरतों को जवाब दे पाएंगे।और जिन लोगों को ऐसा लग रहा हो की मेरा ब्लॉग उनके रंग में भंग डाल रहा है वो अपनी सोच बदले क्योंकि पूरी दुनिया को तो मैं ठीक नहीं कर सकता लेकिन मैं खुद में विश्वास रखने वालों में से हूं इसलिए जहां तक मेरी क्षमता होगी मैं आपके ऐसे रंग में भंग डालने में जरा सा भी संकोच नहीं करूंगा।

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:- अमित मिश्रा

Love is life

Love is life,

This word is pushing itself towards just to get satisfaction of their personal wants.hence it is possible that their desires may lead to exploitation of human nature nd that’s why we can see a lot of condenmalbe cases like rape,murder, robbery,lynching etc.

The all problems persist because lack of love and affection in peoples.If we will understand the real meaning of Humanity then the whole world can be much happier than today.

We have the right to complete our basic needs nd additional desires but it’s also our responsibility that our desires must not adversely effect others life.

Love is life because life can’t be lived without love.So keep loving,keep helping and keep respecting.

:-Amit mishra

Father’s day

अक्सर जब लोग ये पूछते है कि तुझमें इतना धैर्य,साहस, आत्मविशवास,सक्षम आक्रोश,दृढ़ता ये सब कहां से आया तो मैं बस मुस्कुरा देता हूं और मन ही मन एक ही छवि आती है वो है *पापा* की।

उन्होंने ही हम दोनों भाइयों को जीवन के अच्छे से लेकर बुरे दौर तक कैसे जीना चाहिए ये सिखाया और करके दिखाया,उनके बीते हुए कल ने ही हमें दुनियादारी का असल रंग दिखाया और लोगो को पहचानना सिखाया,जिसको मै अपने स्वलिखित कविता के एक पंक्ति से संबोधित करना चाहूंगा “कहने को तो सब अपने है,लेकिन सच में केवल सपने है”।
अक्सर उनका यही कहना होता है कि दुनिया भले बुरी रहे लेकिन हमें अपना कर्म और कर्तव्य कभी नहीं भूलना चाहिए क्योंकि देने वाला तो भगवान है बाकी इंसान क्या लेंगे और क्या देंगे।

मुझे नहीं पता अमित भविष्य में कितना सफल – असफल रहेगा,लेकिन आपका अमित मिश्रा आपके और हमारे पूर्वजों के दिए हुए “मिश्रा” उपनाम को जरूर आगे लेके जाएगा और ये मैं आपके दिए हुए आत्मविश्वास से बोल रहा हूं।
:- अमित मिश्रा

Justice for twinkle

#justicefortwinkle
एक तरफ बेटी पढ़ाओ ,बेटी बचाओ और दूसरी तरफ रेप करो, आंखे निकालो और तेजाब से उसी बेटी को जलाओ??

मोदी जी अगर आप राम मंदिर से पहले इन कुत्तों के लिए इंडिया गेट पे लटकाने का कानून लेके आए तो यकीनन मेरे राम भी खुश होंगे।
राहुल गांधी जी नहीं चाहिए 72000
केजरीवाल सर नहीं चाहिए औरतों के लिए फ्री सबकुछ(जब वो सुरक्षित रहेंगी तो हमारे देश की महिलाएं सक्षम भी है)

अगर सभी पार्टी के नेता मिलकर नया कानून लाना चाहे तो समय ही कितना लगेगा??
लेकिन नहीं सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे है ,इन्हे बस अपने राजनीति से मतलब है क्योंकि इनके घर वाले सुरक्षा में रहते है ना।

ये मेरा अपना सोच था अगर इससे किसी भी पार्टी,नेता,पक्ष,विपक्ष किसी को भी आहत पहुंची हो तो मुझे बिल्कुल खेद नहीं है क्योंकि मेरे लिए देश सबसे ऊपर है और उसके सामने आपका कोई वजूद नहीं।
भारत के दिवंगत भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार संसद के सत्र में कहा था कि – “सरकारें आएंगी, जाएंगी, पार्टियां बनेंगी, बिगड़ेंगी मगर ये देश रहना चाहिए।”

:- अमित मिश्रा

पुलवामा आतंकी हमला

करारा जवाब मिलेगा

मुझे आज इसपे बात नही करना कि कमी क्या थी बल्कि बात इसपे करना है कि कमी क्यों है।
:अलगाववादी नेता जिन्हें हमारे सेना पे भरोसा नही लेकिन वो सैन्य संरक्षण लेने में सबसे आगे होते है और उन्हें दिया भी जाता है।

:पिछले 30 सालों में लगभग 80000 भारतीयों की लाशें बिछा दी गई और हम क्या करते है?शादी में पाकिस्तान जाएंगे तो ठोको ताली ठोको ताली करके जब मन किया उठ के चले जाएंगे।

:पत्थर बाज जिन्हें कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियां नन्हे बच्चे कहते है इन्ही पत्थरबाजों के लिए इजरायल में उम्र कैद तक कि सजा है और हमारे यहाँ जवानों को दोषी ठहरा दिया जाता है।
:हमारे देश के वो हरामखोर,नालायक बच्चे जो देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में नारा लगाते है भारत तेरे टुकड़े होंगे********** आगे मैं नही बोलूंगा आपको पता ही होगा,क्योंकि अल्लाह कभी ऐसी बातों का समर्थन नही करते,और इन निक्कमो पे अभी 3 साल बाद चार्जशीट दायर हुई है।
:मुझे आज भी याद है वो वाक्या जब महबूबा मुफ्ती जी सरकार में थी,उस दौरान एक जगह 3 चेक पोस्ट लगाए गए थे और एक कार सवार जब पीछे के 2 चेक पोस्ट को क्रैश करते हुए नही रुका तो 3रे पर उसे हमारे सेना के द्वारा ढेर कर दिया गया था, उस दौरान वहाँ के सत्ता पक्ष ने ऐसा रोना रोया था कि सेना हमपे जुल्म करती है और जिसके कारण कोर्ट मार्शल हुआ और अभी भी हमारे 3 जवान तिहार जेल में है और वहाँ के जनरल चीफ को मजबूर करके पूरे कश्मीर वासियों से माफी मांगनी पड़ी थी।
अब ऐसे में कोन जवान तिहाड़ जेल जाना चाहेगा?कोन गाड़ियों की चेकिंग करेगा?

और भी कई बातें है जिनसे आप लोग सब वाकिफ होंगे लेकिन मैं अंत मे यही बोलना चाहूंगा कि आपलोग दुःखी मत होइए क्या फर्क पड़ता है? 40 मरे या 400 ?
हमारे देश मे जय हिंद बोलना गुनाह है,नेशनल एंथम बजाना और बजते समय खड़े होना गुनाह है।
भारत तेरे टुकड़े होंगे बोलने वालों को गले लगाइए,पत्थरबाजों को सर पे बिठाइए,आतंकवादियों के लिए रात में कोर्ट खुलवाईये, सेना करवाई करे तो उन्हें जेल और शर्मिंदा करिए।

जय हिंद और आपलोगों को नमस्कार भी नही खून से भरा हुआ लाल सलाम…

:-अमित मिश्रा 🇮🇳

Saraswati pooja

सरस्वती पूजा

सरस्वती पूजा यूं तो ये पूजा सभी लोगों में विशेष स्थान रखता है और हो भी क्यों न माँ शारदे ही तो कला व ज्ञान की देवी हैं,लेकिन अगर बात हमारे बिहार और उत्तर भारतीयों की करें तो हमारे लिए ये बेहद अहम होता है और खास कर के हम बिहार व मिथिला के लोग तो बेसब्री से इसका इंतेज़ार करते है।

पहले के जैसे ही मैं पूजा विधि पे उतना नही लिखूंगा लेकिन संक्षेप में लिखना आवश्यक।
प्रति वर्ष माघ शुक्ल पंचमी को इनकी पूजा की जाती है।
माना जाता है कि ‘शतरूपा’ का आराधना कर के मूर्ख भी ज्ञान अर्जित कर सकता है।
श्वेतपद्मासना देवी हमें यह भी बताती है कि सरल व्यवहार और साधारण पहनावा हमें और उत्कृष्ट बनाता है यदि हममें अहंकार,द्वेष के बजाय ज्ञान व कला अपने अंदर अर्जित करने की चाह हो।

अब माँ सरस्वती का वंदन करते हुए आते है पहले के सरस्वती पूजा पे,सबसे पहले तो कई दिनों पहले से मूर्ति,बैटरी,टेंट,बाजा, जेनेरेटर,हलवाई इन सब को बोल देना होता था,ताकि पूजा के दिन कोई समस्या ना हो।
फिर 1 दिन पहले से टेंट,बाजा, जेनेरेटर वाला आके अपना काम शुरू कर देता था और हम यानी कि बच्चे जिन्हें माँ से बेहद लगाव होता है वो तो खाना भी ऐसे नही खाते थे कि अगर हम देखते नही रहेंगे तो मिस्री चाचा किसी और के यहाँ लगा देंगे सब।
फिर आती थी पूजा से पहले वाली शाम और समय होता था माँ के मूर्त रूप जिसको हमलोग पहले ही कुम्हार के यहाँ पसंद कर आये होते है उसे लाने का,
अब इससे आगे बताने से पहले हमारे घर के पास का भौगोलिक जानकारी भी थोड़ा देना जरूरी है तो वो इस प्रकार था कि या तो आप बारी(अंग्रेज़ी में आपलोग गार्डन समझ सकते है) से 2-3 मिनट का राश्ता तय करके कुम्हार के यहाँ से कंधे पे लाइये या तो बैलगाड़ी, ठेलागाड़ी से 20-30 मिनट का राश्ता चुनिए।
हमलोग तो बचपने से खतरों के खिलाड़ी वो शो तो अब आया है,इसलिए पहला ही राश्ता चुनते थे और भिड़ा देते थे जो थोड़े उम्र और शरीर मे थोड़े बड़े होते थे उनको।
अब रात के 8-9 बज गए होते है और माँ भी आ गयी होती है,अब बारी है सजावट का सब लग जाते है।
माँ, दाई(दादी), चाची लोगो से सारी जमा किया जाता था चमकने और साधारण वाला और फिर बिना पढ़े ही कला निर्देशक का कार्य शुरू कर दिया जाता था,ना जाने कितने बार कोशिश करने के बाद सजावट हो जाती थी फिर कुछ खा के हमारा सोंच होता था क्या सोयेंगे अब लेकिन पापा, चाचा,माँ लोग कहाँ सुनने वाले रहते वो ये बोल के भेज देते की पूजा के रात यानी कि कल जाग लेना और सुबह पूजा के समय भी जागते रहना है इसलिए तुमलोग सब सो जाओ हममें से कोई माँ के पास रहेगा।
सुबह होती है माँ के आवाज से इतना धूप निकल गया, पूजा कब होगा ,यही लोग जागने वाले थे फिर हमलोग जल्द से जल्द उठ के मुँह हाथ धो के ,नहा के पूजा में बैठते थे और फिर पूजा,आरती सभी के साथ संपन्न होती।

अब दोपहर का समय हो गया होता है,और शुरुआत होती है हमारे समय का अब तो जो बाजे पे सुबह से माँ का भजन बज रहा था, वहाँ पे लेटेस्ट रीमिक्स सांग बजेंगे और प्रसाद देने के जगह मैं ही बैठूंगा क्योंकि बहुत मित्र और मित्राणि लोग जो आने वाले होते थे,अब आपलोग भी समझ ही सकते है एक 6ठि-7वी के लड़के की मन की बात लेकिन भाइजी कहाँ समझने वाले थे उन्हें तो अपने बड़े होने का फायदा उठाने का मौका मिले बस ,ऐसे प्रसाद वाले कुर्सी से फेंक देते थे जैसे दादी गोबर को पथिया में से फेकती थी।
लेकिन मैं भी कहाँ मानने वालों में से था और आखिर बात भी तो एक ही दिन हीरो बनने का था ,सब परसादी लेने आने वाले होंगे और इतना पापा का खर्चा करवा के armani का जीन्स-शर्ट,axe का सेंट,set-wet का जेल ये सब लिए होते है वो क्या ऐसे ही जाने देते।
हमारे पास भी माँ नामक बेहद खतरनाक हथियार होती थी जो अपने छोटे बेटे को कैसे मना करेगी वो भी आके फरमान सुना देती थी कि एक बाजे पे बैठेगा और एक प्रसाद देने,बस फिर क्या मैं रोने वाला गाना लगा देता और भाइजी अपने आप उठ जाते…।

फिर हवा भी चलने लगती थी और जिन जिन का इंतज़ार होता था वो भी बस प्रसाद के बदले एक मुस्कान देके चले जाते जैसे हमारे चेहरे पे लिखा हो प्रसाद के बदले मुस्कान देते जाए।
अब दोपहर के बाद और शाम से पहले वाला जो समय होता था उसमें हमें भी बहुत जगह जाके आना होता था और जो लोग बस मुस्कान देके चले गए होते थे उनके घर या मोहल्ले में जाके भी उनसे बदला लेना होता था और है भी पंडित तो सबका स्वागत करना तो लाजमी होता था।

यही सब होते होते शाम हो जाती थी और फिर माँ हंसवाहिनी का संध्या आरती व भोग होता था,जिसके बाद Tv-vcr का इंतज़ाम और साथ ही कैरम-बोर्ड,लूडो भी लाया जाता था ताकि पूरी रात जागने का प्लान सफल रहे।
पूरी रात जागने के बाद फिरसे अगले दिन माँ का पूजावन्दन, आरती होती थी और फिर जैसे जैसे समय बीत-ते जाता था मन उदास होते जाता था क्योंकि शाम में माँ का विसर्जन जो होना होता था और वो क्षण तो सबको रुला जाता था जब माँ,दाई विदाई के लिए माँ शारदे को चुरा-दही का भोग लगाती थी।

खैर परंपरा के अनुसार मन छोटा होते हुए भी विसर्जन की तैयारी की जाती थी और नारे-जयकारे के साथ माँ को ट्रेक्टर पर लेके जाया जाता था और लोगो की हुजूम मानो अब उन्हें रोक ले लेकिन कोई कर नही सकता था।
सब बस बोल रहे होते वीणा पुस्तक धारिणी की जय हो…हंसवाहिनी की जय हो…
और फिर वो क्षण भी दिखने लगता था जब स्वेतरूपधरा देवी माँ को बड़े लोग कंधे पर दूर पोखर में ले जाते दिखते है और हमारे पास रोने व प्रणाम करने के कोई चारा नही होता था।
अब जब घर वापस आते है तो महसूस होता है कि किसी अपने को छोड़ आये है और घर भी उदास है,लेकिन क्या कर सकते है खुद के साथ साथ घर को भी बताते थे ये तो बस माँ का मूर्त रूप था ,माँ तो हमेशा हमारे पास है और उनका ये रूप भी अगले वर्ष फिर आएगा।
फिलहाल कई वर्षों से गांव से बाहर होने के कारण ये सुखद अनुभव तो नही मिल पाया है और बाहर तो होता भी है तो पूजनोत्सव नही उत्सव के लिए पूजा किया जाता है।
:-अमित मिश्रा

मैथिली भाषा~Maithili language

जहा तक मैंने पढ़ा,बोला व जाना है
मैथिली कोई बोली नही बल्कि एक सक्षम भाषा है, क्योंकि इसके पास अपना लिपि व व्याकरण व सहित्य की भंडार है।

लिपि:
पहले इसे मिथिलाक्षर तथा कैथी लिपि में लिखा जाता था जो बांग्ला और असमिया लिपियों से मिलती थी पर कालान्तर में देवनागरी का प्रयोग होने लगा। मिथिलाक्षर को तिरहुता या वैदेही लिपी के नाम से भी जाना जाता है। यह असमिया, बांगला व उड़िया लिपियों की जननी है। उड़िया लिपी बाद में द्रविड़ भाषाओं के सम्पर्क के कारण परिवर्तित हुई।

इतिहास:
और इसके इतिहास के लिए क्या बोले इसका प्रमाण तो रामायण में मिलता है जहाँ राजा जनक की ये राज्यभाषा थी।
और लगभग 800ई के आसपास ही इसमें रचनाए की जाने लगी।

साहित्य:
14-15वी सताब्दी के महान कवि विद्यापति को मैथिली साहित्य में सबसे ऊंचा दर्जा प्राप्त है।

स्थिति:
भारत की साहित्य अकादमी द्वारा मैथिली को साहित्यिक भाषा का दर्जा पंडित नेहरू के समय १९६५ से हासिल है। २२ दिसंबर २००३ को भारत सरकार द्वारा मैथिली को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में भी शामिल किया गया है और नेपाल सरकार द्वारा मैथिली को नेपाल में दूसरे स्थान में रखा गया है।

:-अमित मिश्रा

रेफरेन्स(स्वयं बुद्धि,गूगल बाबा व मेरे बाबा)

आत्मचिंतन~Introspection

‘आत्मचिंतन’
(आजकल के समय,रिश्तों में इसकी आवश्यकता… )
आत्मचिंतन का अर्थ होता है स्वयं के भीतर शोध।

आज के समय मे सब व्यस्त है जिसके कारण लोग अपने आपको व अपनो को समय नही दे पाते और इसी कारण वे कही न कही उन खुशियों के क्षण को जी नही पाते जिन्हें वो जी सकते है,मैं भी नही जी पाता।
और यदि कभी हम अपनो के लिए समय निकाल भी लेते है तो कुछ न कुछ उन समय के व्यतीत होते वक़्त गलतफहमियां हो जाती है ,जिनका अस्तित्व तो सच्चाई मे कुछ नही होता लेकिन इक्तेफाक से वो एक विशाल रूप ले लेता है।और ये चीज अक्सर हर रिश्ते में आजकल देखने को मिल रहा है ,मैंने भी अनुभव किया है।
इसका मुख्य कारण होता है हमेशा इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में व्यस्त रहना, काम-काज का तनाव व अपने या अपनो के ऊपर समय व्यतीत न कर पाना और इसके बाद यदि हम थोड़ा समय निकाल भी लेते है तो हम बस ये चाहते है कि वो पूरा समय बस हमारा हो और जिसके कारण छोटी-मोटी बातें भी बड़ा रूप ले लेती है।

और तब जरूरत पड़ती है ‘आत्मचिंतन’ की क्योंकि गलत और कुछ नही बस समयानुसार खुद को ना समझना होता है ,समय कभी रुकता नही हमेशा बदलते रहता है तदानुसार हमे भी स्वयं का चिंतन करके स्वयं में बदलाव लाना चाहिए और फिर आप समय के साथ तो सब आपके साथ।
मैं तो कर रहा हूँ खुद पे शोध आप भी करिये ये कठिन बड़ा होता है क्योंकि इससे हमें खुद की कमियां,खामियां और भी सब नजर आ जाती है,लेकिन यकीन मानिये ‘आत्मचिंतन’ आपको एक जरिया के रूप में नजर आएगा जो आपको और बेहतर बनाते जाएगा।
और मेरा मानना है”चिंता चिता समान होता है और चिंतन सूर्य समान” अथार्त:आप चिंता करके कुछ नही कर सकते परंतु चिंतन करके आप सूर्य के समान उज्जवलित हो सकते है जिसमे कमिया तो जरूर होंगी लेकिन खूबी की चमक बहुत ज्यादा होगी….

:-अमित मिश्रा

छठ पूजा

*छठ पूजा*
यूं तो छठ पूजा का नाम आते ही केवल इसे बिहार वाशियों से जोड़ा जाता है,लेकिन केहते है ना आस्था पे कोई प्रतिबंध नही होता और इसीलिए आजकल ये आस्था का पर्व आपको भिन्न भिन्न प्रान्त के लोगो द्वारा भी करते हुए दिख जाएगा।
ये हम सबके लिए एक विशेष क्षण होता है ,अब हो भी क्यों ना हमारा सबसे बड़का पर्व होता है भाई,यही तो मौका होता है कि जो गांव पूरा का पूरा खाली रहता है पूरे साल वो चकमक करते हुए लोगों से भर जाता है।
सबसे पहले तो ई कह दूं कि अगर आप भी हमारे जैसे बाहर रहते है गांव से तो सम्भल जाए क्योंकि यही एक मौका होता हमें लूटने का,अब करे भी क्या वो बिहारी कह के हमे लूटते है और हम भी वहाँ समझदार होते हुए कुछो नही कर सकते काहे की सवाल आस्था का है ना और जाना तो है ही और सरकार तो हमारा कब सुनी है जो अब सुनेगी, यूं तो ट्रैन की टिकट उपलब्ध नही होती लेकिन जितना ज्यादा आप पैसा फेकेंगे उतना ही आपको ज्यादा मौका मिलेगा सीट पाने का और तो और 3महीना पहिले से हवाईयो जहाज का ‘भाड़ा मतलब की फेयर’ बहुते बढ़ जाता है मानो की वो भी इंतेज़ार में होते हैं।खैर सिस्टम पे बोलने लगे तो और कुछो नही लिख पाएंगे,और करे भी क्या हम बिहार वाले है ना सब हमको बकलोल बोल के चुप कराने के कोशिश में ही होते हैं।
और जो लोग हम जैसे इस महापर्व में भी अपने घर नही जा पाते वो बीते सालों के अनुभव को ऐसे याद करते है…👇👇
बात करें छठ पूजा की तो दीवाली खत्म होते ही इसकी तैयारियां शुरू हो जाती है,चार दिनों का ये पर्व दीवाली के चौथे दिन नहाय-खाय से शरू होता है इस दिन व्रती (खास तौर पर महिला साथ ही बहुत सारे पुरुष) स्नान करके फिर शुद्ध,सात्विक (विशेषतः घी से बना और कद्दू की सब्जी)खाना खाते है और ऐसे शुरूआत होती है इस महापर्व की।
दूसरे दिन यानी कि दीवाली के पांचवे दिन खरना(खीर-रोटी) इस दिन व्रती पूरे दिन बिना अन्न और जल के रहते है और सांझ के समय खीर-रोटी बना कर पूजा करने के उपरांत उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते है और इसे ही खरना कहा जाता है।इसके बाद पारण तक व्रती ना कुछ खाते है और ना कुछ पीते मतलब की उनका निर्जला व्रत शुरू हो जाता है,साथ ही व्रती जल और अन्न के साथ शैय्या का भी त्याग करते है सोने के लिए केवल कंबल का उपयोग करते है।
तीसरे दिन यानी कि दीवाली के छठे दिन घर के बड़े खाली पैर ढाकी लेके पोखैर, नदी के किनारे जाते हैं जहाँ व्रतियों के द्वारा डूबते हुए सूरज को अर्घ दिया जाता है,अर्घ कोनिया में फल,नारियल,कुशियार, ठकुआ,भुशुआ सब लेके दिया जाता है।महिला और परुष इसमे निखण्ड सारी और धोती का प्रयोग करते है जो कि विशेषतः पियर या भगवा रंग का होता है।फिर डूबते सूरज को अर्घ देने के बाद व्रती कपड़ा बदल कर घर आ जाते है और घर के बड़े चच्चा,पप्पा ढाकी उठा के घर के तरफ आ जाते है और हमे क्या हम तो बस मुरही,कचरी,लिट्टी,समोसा ये सब खा लेते है और घर के लिए भी ले लेते है क्योंकि कोन त्योहार में घर का खाना चाहता है।
चौथे दिन भोरे भोर मतलब बूझिये तो उस दिन सोता कोन है जैसे ही कोई चच्चा बाहर से आवाज दिए कि हम बच्चा पार्टी जाके सबको झूठो का बोल देते है कि सब चले गए टोल से,अब जल्दी जाके वहाँ छुरछुरी,मिरचइया ये सब फोड़ना होता है और साथ ही अपने संगी को भी तो वादा किये होते है कि तुमको हम उतने भीड़ में भो जरूर ढूंढ लेंगे,क्या करे टिनहीँ हीरो जे ठहरे।
खैर तो पापा, चाचा सब ढाकी लेके फिरसे पोखैर,नदी जाने लगते है और व्रती लोग भो उनके पीछे पीछे।
इस समय भोरे भोरे ऐसा ठंडा हवा लगता है कि क्या बताए जैकेट,स्विटर के अंदर ढुक के सट-सटा देता है।
फिर पोखैर पर पहुँचने के बाद वहां पप्पा-चच्चा सब ढाकी में से सब समान निकालने लगते है और हम फटक्का सब लेके निकल जाते है फोड़ने और उससे ज्यादा अपने संगी को दिखाना होता है कि हमारा फटक्का सबसे अच्छा है।
इस सब के बाद व्रती फिर से पानी मे खड़े हो जाते है और सूरज देव के उगने के इंतेज़ार करने लगते है और कहते है ना इंतेज़ार के समय वक़्त लंबा ही हो जाता और ऐसा ही तभी सबको लगता रहता है क्योंकि बहुते ठंडी लगते रहता है।
आखिरकार सूरज देव अपने समय पर निकलते है और व्रती लोग के आंख में लाल चमक दे देते है फिर व्रती उन्हें अर्घ देते है और प्रणाम करके आशीष,मनोकामना मांग के बाहर आ जाते है और कपड़े बदल लेते है।
और ऐसे ही आस्था का ये महापर्व इस रूप से सम्पन्न होता है और व्रती लगभग 40 घंटे के बाद कुछ ग्रहण करते हैं।
और हम तो पूरे दिन कुशियार का गर्दा उड़ा देते है।

ऊपर जितना कुछ लिखे है वो सब हमारा बिता हुआ क्षण है अब बहुते कुछ बदल गया होगा क्योंकि 7सालों से इस महापर्व में शामिल होने का सुख नही मिला है,जब मिलेगा तो अपडेट कर देंगे।
:-अमित मिश्रा