सरस्वती पूजा
सरस्वती पूजा यूं तो ये पूजा सभी लोगों में विशेष स्थान रखता है और हो भी क्यों न माँ शारदे ही तो कला व ज्ञान की देवी हैं,लेकिन अगर बात हमारे बिहार और उत्तर भारतीयों की करें तो हमारे लिए ये बेहद अहम होता है और खास कर के हम बिहार व मिथिला के लोग तो बेसब्री से इसका इंतेज़ार करते है।
पहले के जैसे ही मैं पूजा विधि पे उतना नही लिखूंगा लेकिन संक्षेप में लिखना आवश्यक।
प्रति वर्ष माघ शुक्ल पंचमी को इनकी पूजा की जाती है।
माना जाता है कि ‘शतरूपा’ का आराधना कर के मूर्ख भी ज्ञान अर्जित कर सकता है।
श्वेतपद्मासना देवी हमें यह भी बताती है कि सरल व्यवहार और साधारण पहनावा हमें और उत्कृष्ट बनाता है यदि हममें अहंकार,द्वेष के बजाय ज्ञान व कला अपने अंदर अर्जित करने की चाह हो।
अब माँ सरस्वती का वंदन करते हुए आते है पहले के सरस्वती पूजा पे,सबसे पहले तो कई दिनों पहले से मूर्ति,बैटरी,टेंट,बाजा, जेनेरेटर,हलवाई इन सब को बोल देना होता था,ताकि पूजा के दिन कोई समस्या ना हो।
फिर 1 दिन पहले से टेंट,बाजा, जेनेरेटर वाला आके अपना काम शुरू कर देता था और हम यानी कि बच्चे जिन्हें माँ से बेहद लगाव होता है वो तो खाना भी ऐसे नही खाते थे कि अगर हम देखते नही रहेंगे तो मिस्री चाचा किसी और के यहाँ लगा देंगे सब।
फिर आती थी पूजा से पहले वाली शाम और समय होता था माँ के मूर्त रूप जिसको हमलोग पहले ही कुम्हार के यहाँ पसंद कर आये होते है उसे लाने का,
अब इससे आगे बताने से पहले हमारे घर के पास का भौगोलिक जानकारी भी थोड़ा देना जरूरी है तो वो इस प्रकार था कि या तो आप बारी(अंग्रेज़ी में आपलोग गार्डन समझ सकते है) से 2-3 मिनट का राश्ता तय करके कुम्हार के यहाँ से कंधे पे लाइये या तो बैलगाड़ी, ठेलागाड़ी से 20-30 मिनट का राश्ता चुनिए।
हमलोग तो बचपने से खतरों के खिलाड़ी वो शो तो अब आया है,इसलिए पहला ही राश्ता चुनते थे और भिड़ा देते थे जो थोड़े उम्र और शरीर मे थोड़े बड़े होते थे उनको।
अब रात के 8-9 बज गए होते है और माँ भी आ गयी होती है,अब बारी है सजावट का सब लग जाते है।
माँ, दाई(दादी), चाची लोगो से सारी जमा किया जाता था चमकने और साधारण वाला और फिर बिना पढ़े ही कला निर्देशक का कार्य शुरू कर दिया जाता था,ना जाने कितने बार कोशिश करने के बाद सजावट हो जाती थी फिर कुछ खा के हमारा सोंच होता था क्या सोयेंगे अब लेकिन पापा, चाचा,माँ लोग कहाँ सुनने वाले रहते वो ये बोल के भेज देते की पूजा के रात यानी कि कल जाग लेना और सुबह पूजा के समय भी जागते रहना है इसलिए तुमलोग सब सो जाओ हममें से कोई माँ के पास रहेगा।
सुबह होती है माँ के आवाज से इतना धूप निकल गया, पूजा कब होगा ,यही लोग जागने वाले थे फिर हमलोग जल्द से जल्द उठ के मुँह हाथ धो के ,नहा के पूजा में बैठते थे और फिर पूजा,आरती सभी के साथ संपन्न होती।
अब दोपहर का समय हो गया होता है,और शुरुआत होती है हमारे समय का अब तो जो बाजे पे सुबह से माँ का भजन बज रहा था, वहाँ पे लेटेस्ट रीमिक्स सांग बजेंगे और प्रसाद देने के जगह मैं ही बैठूंगा क्योंकि बहुत मित्र और मित्राणि लोग जो आने वाले होते थे,अब आपलोग भी समझ ही सकते है एक 6ठि-7वी के लड़के की मन की बात लेकिन भाइजी कहाँ समझने वाले थे उन्हें तो अपने बड़े होने का फायदा उठाने का मौका मिले बस ,ऐसे प्रसाद वाले कुर्सी से फेंक देते थे जैसे दादी गोबर को पथिया में से फेकती थी।
लेकिन मैं भी कहाँ मानने वालों में से था और आखिर बात भी तो एक ही दिन हीरो बनने का था ,सब परसादी लेने आने वाले होंगे और इतना पापा का खर्चा करवा के armani का जीन्स-शर्ट,axe का सेंट,set-wet का जेल ये सब लिए होते है वो क्या ऐसे ही जाने देते।
हमारे पास भी माँ नामक बेहद खतरनाक हथियार होती थी जो अपने छोटे बेटे को कैसे मना करेगी वो भी आके फरमान सुना देती थी कि एक बाजे पे बैठेगा और एक प्रसाद देने,बस फिर क्या मैं रोने वाला गाना लगा देता और भाइजी अपने आप उठ जाते…।
फिर हवा भी चलने लगती थी और जिन जिन का इंतज़ार होता था वो भी बस प्रसाद के बदले एक मुस्कान देके चले जाते जैसे हमारे चेहरे पे लिखा हो प्रसाद के बदले मुस्कान देते जाए।
अब दोपहर के बाद और शाम से पहले वाला जो समय होता था उसमें हमें भी बहुत जगह जाके आना होता था और जो लोग बस मुस्कान देके चले गए होते थे उनके घर या मोहल्ले में जाके भी उनसे बदला लेना होता था और है भी पंडित तो सबका स्वागत करना तो लाजमी होता था।
यही सब होते होते शाम हो जाती थी और फिर माँ हंसवाहिनी का संध्या आरती व भोग होता था,जिसके बाद Tv-vcr का इंतज़ाम और साथ ही कैरम-बोर्ड,लूडो भी लाया जाता था ताकि पूरी रात जागने का प्लान सफल रहे।
पूरी रात जागने के बाद फिरसे अगले दिन माँ का पूजावन्दन, आरती होती थी और फिर जैसे जैसे समय बीत-ते जाता था मन उदास होते जाता था क्योंकि शाम में माँ का विसर्जन जो होना होता था और वो क्षण तो सबको रुला जाता था जब माँ,दाई विदाई के लिए माँ शारदे को चुरा-दही का भोग लगाती थी।
खैर परंपरा के अनुसार मन छोटा होते हुए भी विसर्जन की तैयारी की जाती थी और नारे-जयकारे के साथ माँ को ट्रेक्टर पर लेके जाया जाता था और लोगो की हुजूम मानो अब उन्हें रोक ले लेकिन कोई कर नही सकता था।
सब बस बोल रहे होते वीणा पुस्तक धारिणी की जय हो…हंसवाहिनी की जय हो…
और फिर वो क्षण भी दिखने लगता था जब स्वेतरूपधरा देवी माँ को बड़े लोग कंधे पर दूर पोखर में ले जाते दिखते है और हमारे पास रोने व प्रणाम करने के कोई चारा नही होता था।
अब जब घर वापस आते है तो महसूस होता है कि किसी अपने को छोड़ आये है और घर भी उदास है,लेकिन क्या कर सकते है खुद के साथ साथ घर को भी बताते थे ये तो बस माँ का मूर्त रूप था ,माँ तो हमेशा हमारे पास है और उनका ये रूप भी अगले वर्ष फिर आएगा।
फिलहाल कई वर्षों से गांव से बाहर होने के कारण ये सुखद अनुभव तो नही मिल पाया है और बाहर तो होता भी है तो पूजनोत्सव नही उत्सव के लिए पूजा किया जाता है।
:-अमित मिश्रा