सब्र

सब्र-ए-समीम हो तो किसी की तलब नही होती,
तलब न हो तो कोई सबब नही बनती
और फिर जब कोई सबब ही ना हो तो सिर्फ सब्र ही सब्र रह जाती है।
:-अमित मिश्रा

बांकी है।

अभी तो इन आँखों मे एहतराम बांकी है,
अभी तो इन लबों पे सुकुन-ए मुश्कान बांकी है,
अभी तो बदले हुए लोगों से जमाने को बदल देने का इन्तेक़ाम बांकी है
चलते जाना है,बढ़ते जाना है क्योंकि मेरे दोस्त अभी तो इंतकाल बांकी है।
:-अमित मिश्रा

बदला

#salutetoindianforces
#salutetoairforce

45 जवानों के शहादत के बदले 200-300 आतंकवादियों की मौत।
300किलो विस्फोटक का जवाब 1000 किलो विस्फोटक।
एक कार के बदले 12 मिराज लड़ाकू विमान,12 ठिकाने वो भी बारहवें दिन।
कश्मीर में आतंकवादियों को भेजकर हमला कराने का बदला नाकि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर बल्कि पाकिस्तान में घुसकर आतंक का सफाया( मुजफ्फराबाद,चकोटी,बालाकोट)।

#जयहिंद🇮🇳
:-अमित मिश्रा 💐🇮🇳🇮🇳🙏

#Pulwama

आप अपने चाहने वालों को लाल गुलाब दे रहे थे,वो आपके लिए देश की मिट्टी लाल कर गए।

जय हिंद,लाल सलाम🇮🇳🇮🇳
:-अमित मिश्रा

पुलवामा आतंकी हमला

करारा जवाब मिलेगा

मुझे आज इसपे बात नही करना कि कमी क्या थी बल्कि बात इसपे करना है कि कमी क्यों है।
:अलगाववादी नेता जिन्हें हमारे सेना पे भरोसा नही लेकिन वो सैन्य संरक्षण लेने में सबसे आगे होते है और उन्हें दिया भी जाता है।

:पिछले 30 सालों में लगभग 80000 भारतीयों की लाशें बिछा दी गई और हम क्या करते है?शादी में पाकिस्तान जाएंगे तो ठोको ताली ठोको ताली करके जब मन किया उठ के चले जाएंगे।

:पत्थर बाज जिन्हें कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियां नन्हे बच्चे कहते है इन्ही पत्थरबाजों के लिए इजरायल में उम्र कैद तक कि सजा है और हमारे यहाँ जवानों को दोषी ठहरा दिया जाता है।
:हमारे देश के वो हरामखोर,नालायक बच्चे जो देश के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में नारा लगाते है भारत तेरे टुकड़े होंगे********** आगे मैं नही बोलूंगा आपको पता ही होगा,क्योंकि अल्लाह कभी ऐसी बातों का समर्थन नही करते,और इन निक्कमो पे अभी 3 साल बाद चार्जशीट दायर हुई है।
:मुझे आज भी याद है वो वाक्या जब महबूबा मुफ्ती जी सरकार में थी,उस दौरान एक जगह 3 चेक पोस्ट लगाए गए थे और एक कार सवार जब पीछे के 2 चेक पोस्ट को क्रैश करते हुए नही रुका तो 3रे पर उसे हमारे सेना के द्वारा ढेर कर दिया गया था, उस दौरान वहाँ के सत्ता पक्ष ने ऐसा रोना रोया था कि सेना हमपे जुल्म करती है और जिसके कारण कोर्ट मार्शल हुआ और अभी भी हमारे 3 जवान तिहार जेल में है और वहाँ के जनरल चीफ को मजबूर करके पूरे कश्मीर वासियों से माफी मांगनी पड़ी थी।
अब ऐसे में कोन जवान तिहाड़ जेल जाना चाहेगा?कोन गाड़ियों की चेकिंग करेगा?

और भी कई बातें है जिनसे आप लोग सब वाकिफ होंगे लेकिन मैं अंत मे यही बोलना चाहूंगा कि आपलोग दुःखी मत होइए क्या फर्क पड़ता है? 40 मरे या 400 ?
हमारे देश मे जय हिंद बोलना गुनाह है,नेशनल एंथम बजाना और बजते समय खड़े होना गुनाह है।
भारत तेरे टुकड़े होंगे बोलने वालों को गले लगाइए,पत्थरबाजों को सर पे बिठाइए,आतंकवादियों के लिए रात में कोर्ट खुलवाईये, सेना करवाई करे तो उन्हें जेल और शर्मिंदा करिए।

जय हिंद और आपलोगों को नमस्कार भी नही खून से भरा हुआ लाल सलाम…

:-अमित मिश्रा 🇮🇳

Nature

कोन केहता है जमीन-आसमान में बहुत अंतर है,मुझे तो अंततः दोनों मिलते ही दिखते है।
:-अमित मिश्रा

Saraswati pooja

सरस्वती पूजा

सरस्वती पूजा यूं तो ये पूजा सभी लोगों में विशेष स्थान रखता है और हो भी क्यों न माँ शारदे ही तो कला व ज्ञान की देवी हैं,लेकिन अगर बात हमारे बिहार और उत्तर भारतीयों की करें तो हमारे लिए ये बेहद अहम होता है और खास कर के हम बिहार व मिथिला के लोग तो बेसब्री से इसका इंतेज़ार करते है।

पहले के जैसे ही मैं पूजा विधि पे उतना नही लिखूंगा लेकिन संक्षेप में लिखना आवश्यक।
प्रति वर्ष माघ शुक्ल पंचमी को इनकी पूजा की जाती है।
माना जाता है कि ‘शतरूपा’ का आराधना कर के मूर्ख भी ज्ञान अर्जित कर सकता है।
श्वेतपद्मासना देवी हमें यह भी बताती है कि सरल व्यवहार और साधारण पहनावा हमें और उत्कृष्ट बनाता है यदि हममें अहंकार,द्वेष के बजाय ज्ञान व कला अपने अंदर अर्जित करने की चाह हो।

अब माँ सरस्वती का वंदन करते हुए आते है पहले के सरस्वती पूजा पे,सबसे पहले तो कई दिनों पहले से मूर्ति,बैटरी,टेंट,बाजा, जेनेरेटर,हलवाई इन सब को बोल देना होता था,ताकि पूजा के दिन कोई समस्या ना हो।
फिर 1 दिन पहले से टेंट,बाजा, जेनेरेटर वाला आके अपना काम शुरू कर देता था और हम यानी कि बच्चे जिन्हें माँ से बेहद लगाव होता है वो तो खाना भी ऐसे नही खाते थे कि अगर हम देखते नही रहेंगे तो मिस्री चाचा किसी और के यहाँ लगा देंगे सब।
फिर आती थी पूजा से पहले वाली शाम और समय होता था माँ के मूर्त रूप जिसको हमलोग पहले ही कुम्हार के यहाँ पसंद कर आये होते है उसे लाने का,
अब इससे आगे बताने से पहले हमारे घर के पास का भौगोलिक जानकारी भी थोड़ा देना जरूरी है तो वो इस प्रकार था कि या तो आप बारी(अंग्रेज़ी में आपलोग गार्डन समझ सकते है) से 2-3 मिनट का राश्ता तय करके कुम्हार के यहाँ से कंधे पे लाइये या तो बैलगाड़ी, ठेलागाड़ी से 20-30 मिनट का राश्ता चुनिए।
हमलोग तो बचपने से खतरों के खिलाड़ी वो शो तो अब आया है,इसलिए पहला ही राश्ता चुनते थे और भिड़ा देते थे जो थोड़े उम्र और शरीर मे थोड़े बड़े होते थे उनको।
अब रात के 8-9 बज गए होते है और माँ भी आ गयी होती है,अब बारी है सजावट का सब लग जाते है।
माँ, दाई(दादी), चाची लोगो से सारी जमा किया जाता था चमकने और साधारण वाला और फिर बिना पढ़े ही कला निर्देशक का कार्य शुरू कर दिया जाता था,ना जाने कितने बार कोशिश करने के बाद सजावट हो जाती थी फिर कुछ खा के हमारा सोंच होता था क्या सोयेंगे अब लेकिन पापा, चाचा,माँ लोग कहाँ सुनने वाले रहते वो ये बोल के भेज देते की पूजा के रात यानी कि कल जाग लेना और सुबह पूजा के समय भी जागते रहना है इसलिए तुमलोग सब सो जाओ हममें से कोई माँ के पास रहेगा।
सुबह होती है माँ के आवाज से इतना धूप निकल गया, पूजा कब होगा ,यही लोग जागने वाले थे फिर हमलोग जल्द से जल्द उठ के मुँह हाथ धो के ,नहा के पूजा में बैठते थे और फिर पूजा,आरती सभी के साथ संपन्न होती।

अब दोपहर का समय हो गया होता है,और शुरुआत होती है हमारे समय का अब तो जो बाजे पे सुबह से माँ का भजन बज रहा था, वहाँ पे लेटेस्ट रीमिक्स सांग बजेंगे और प्रसाद देने के जगह मैं ही बैठूंगा क्योंकि बहुत मित्र और मित्राणि लोग जो आने वाले होते थे,अब आपलोग भी समझ ही सकते है एक 6ठि-7वी के लड़के की मन की बात लेकिन भाइजी कहाँ समझने वाले थे उन्हें तो अपने बड़े होने का फायदा उठाने का मौका मिले बस ,ऐसे प्रसाद वाले कुर्सी से फेंक देते थे जैसे दादी गोबर को पथिया में से फेकती थी।
लेकिन मैं भी कहाँ मानने वालों में से था और आखिर बात भी तो एक ही दिन हीरो बनने का था ,सब परसादी लेने आने वाले होंगे और इतना पापा का खर्चा करवा के armani का जीन्स-शर्ट,axe का सेंट,set-wet का जेल ये सब लिए होते है वो क्या ऐसे ही जाने देते।
हमारे पास भी माँ नामक बेहद खतरनाक हथियार होती थी जो अपने छोटे बेटे को कैसे मना करेगी वो भी आके फरमान सुना देती थी कि एक बाजे पे बैठेगा और एक प्रसाद देने,बस फिर क्या मैं रोने वाला गाना लगा देता और भाइजी अपने आप उठ जाते…।

फिर हवा भी चलने लगती थी और जिन जिन का इंतज़ार होता था वो भी बस प्रसाद के बदले एक मुस्कान देके चले जाते जैसे हमारे चेहरे पे लिखा हो प्रसाद के बदले मुस्कान देते जाए।
अब दोपहर के बाद और शाम से पहले वाला जो समय होता था उसमें हमें भी बहुत जगह जाके आना होता था और जो लोग बस मुस्कान देके चले गए होते थे उनके घर या मोहल्ले में जाके भी उनसे बदला लेना होता था और है भी पंडित तो सबका स्वागत करना तो लाजमी होता था।

यही सब होते होते शाम हो जाती थी और फिर माँ हंसवाहिनी का संध्या आरती व भोग होता था,जिसके बाद Tv-vcr का इंतज़ाम और साथ ही कैरम-बोर्ड,लूडो भी लाया जाता था ताकि पूरी रात जागने का प्लान सफल रहे।
पूरी रात जागने के बाद फिरसे अगले दिन माँ का पूजावन्दन, आरती होती थी और फिर जैसे जैसे समय बीत-ते जाता था मन उदास होते जाता था क्योंकि शाम में माँ का विसर्जन जो होना होता था और वो क्षण तो सबको रुला जाता था जब माँ,दाई विदाई के लिए माँ शारदे को चुरा-दही का भोग लगाती थी।

खैर परंपरा के अनुसार मन छोटा होते हुए भी विसर्जन की तैयारी की जाती थी और नारे-जयकारे के साथ माँ को ट्रेक्टर पर लेके जाया जाता था और लोगो की हुजूम मानो अब उन्हें रोक ले लेकिन कोई कर नही सकता था।
सब बस बोल रहे होते वीणा पुस्तक धारिणी की जय हो…हंसवाहिनी की जय हो…
और फिर वो क्षण भी दिखने लगता था जब स्वेतरूपधरा देवी माँ को बड़े लोग कंधे पर दूर पोखर में ले जाते दिखते है और हमारे पास रोने व प्रणाम करने के कोई चारा नही होता था।
अब जब घर वापस आते है तो महसूस होता है कि किसी अपने को छोड़ आये है और घर भी उदास है,लेकिन क्या कर सकते है खुद के साथ साथ घर को भी बताते थे ये तो बस माँ का मूर्त रूप था ,माँ तो हमेशा हमारे पास है और उनका ये रूप भी अगले वर्ष फिर आएगा।
फिलहाल कई वर्षों से गांव से बाहर होने के कारण ये सुखद अनुभव तो नही मिल पाया है और बाहर तो होता भी है तो पूजनोत्सव नही उत्सव के लिए पूजा किया जाता है।
:-अमित मिश्रा

शीत में मीत

हम शीतलहर के शीत, आहाँ घुरक आइग प्रिय।
हम भोरक धूईन ,आहाँ बेरिया के रौद प्रिय।
हम शीतल ओष ,आहाँ नारक टाल प्रिय।
हम जारक डिमडिमैत दिनकर,आहाँ सउँसे पसरल धुइन प्रिय।
हम जेना लागी नबका जैकेट, आहाँ ऊनक स्विटर प्रिय।
हम पियरका गेंदा ,आहाँ रेक्ति गेंदा प्रिय।
हम चूरा के लाई ,आहाँ तिलक तिलबा प्रिय।
हम त बखान क रहल छी जार के जे आहाँ बिन नई भ सकत प्रिय,
अहि जार में हम और आहाँ गर संगहि रहितौ त लिख सकीतौ कनि और प्रिय…।
:- अमित मिश्रा

जरूरी है

“जरूरी है”
आँखों मे नमी भी जरूरी है,
होठों पे हँसी भी जरूरी है।
नजदीकियाँ भी जरूरी है,
फासले भी जरूरी है।
साथ भी जरूरी है,
एहसास भी जरूरी है।
समझौते भी जरूरी है,
फैसले भी जरूरी है।
तेरी मौजूदगी भी जरूरी है,
तेरी कमी भी जरूरी है।
सच तो ये है जिंदगी भी जरूरी है,
और जिंदगी की बन्दगी भी जरूरी है।
:-अमित मिश्रा

मिथिला के विवाह

मिथिलांचल में वैवाहिक रीति-रिवाज कनि अलग होइत ऐच्छ। ज्यादातर अपन-सभहक जीवन शैली स अपरिचित लोग के मिथिला के विवाह के विध–व्यवहार बेतुका और दीर्घावधि वला लगैत ऐच्छ। लेकिन ई सर्वविदित ऐच्छ की मैथिल दम्पतिं में जे पारस्परिक प्रेम भाव होइत ऐच्छ, एक दोसर के प्रति जे सम्मान के भावना होइत ऐच्छ, से गौर करे वला बात ऐच्छ। कखनो कखनो त एकदम बेमेल विवाह सेहो सफल भ जाइत ऐच्छ।
सबसे पहीले वर जखन वधु के द्वार पर आबैत छैथ त वर के सब के समक्ष अपन वस्त्र बदले परैत ऐच्छ ताकि वर के कोनो शारीरिक दोष त नई छैन? तहन विधकरी(एकटा अनुभवी महिला जही पर सबटा विधि–व्यवहार करबाबई के जिम्मा होइत ऐच्छ) द्वारा परिछन के दौरान हुनका स गृह्स्त जीवन के व्यवहारिक प्रश्न पुच्छल जाइत ऐच्छ।

फेर कोहबर में नैना -जोगिन, जिहिमे भावी पत्नी और साली के बिना देखले एक के चुनई के रहैत ऐच्छ। अहिमे लोके सबके बहुत मनोरंजन होइत ऐच्छ साथ में वर के पारखी नजर समझ में आबैत ऐच्छ।
ओहि के बाद समाज परिवारके बुजुर्ग सब के साथ मिल क ओठंगर कुटल जाइत ऐच्छ यानि पुरा समाज के स्वीकृति के साथ गृहस्त जीवन में प्रवेश के अनुमति।
चाहे ओठंगर कूटनाई हो या भाई के साथ मिल क धान के लावा छीटनाई, ई सब रिवाज के पीछे कोनो न कोनो व्यवहारिकतर्क होईत ऐच्छ।
फेर आम के कांच लकड़िं के प्रज्वलित क के ओहिके समक्ष मन्त्र द्वारा विवाह संपन्न करवायल जाइत ऐच्छ ओहे अग्नि पर ओठंगर में कुटल धान के चावल स वर खीर बनायल जाइत ऐच्छ अर्थात गृहस्तथी में पूर्ण सहयोग क तैयारी।
वधु के प्रथम सिंदूर दान अलग सिंदूर( भुसना) स कइल जाइत ऐच्छ! अहि विवाह के बाद वर–वधु कोहबर (वर –वधू के कमरा ) में जाइत छैथ। कोहबर के चित्र द्वारा सजायल जाइत ऐच्छ। जिहीमे सांकेतिक रूप में गृहस्त जीवन के महत्व के दिखायल जाईत ऐच्छ।
अहि दिन सुहाग शैया नई सजायल जाइत ऐच्छ बल्कि जमीन पर सुतई के व्यवस्था होइत ऐच्छ। कोहबर में विधकरी वघू के ल क आबैत छैथ और वर–वधु के झिझक के तोड़ई के माध्यम बनैत छैथ।
अगला तीन दिन तक इहे क्रम चलइत ऐच्छ,अहि तीन दिन के दौरान वर–वधु के भोजन में नमक नहीं खुआयल जाइत ऐच्छ, ताकि इन्द्रियां शिथिल रहइ।
रस्म के दौर पूरा दिन चलइत रहइत ऐच्छ। वर –वधु एक दोसर के भली–भांति समईझ लैत छैथ।
हाँ, बाराती गण वर के छोईड़ क वापस चैल जाइत छैथ।असल विवाह चौथा दिन पुनः होईत अइछ। अगर कन्या अपरिपक्व होई त, वर कुछ दिन ससुराले में रही जाइत छैथ ताकि कन्या के अंचिन्हार माहौल में ढले में असुविधा नई होई। कखनो कखनो त सालभर या ओहि स ज्यादा दिन तक लड़की मायके में रहई छैथ। अहि दौरान साल भईर हर तीज–त्यौहार में लड़की के लेल सौगात आबैत रहैत ऐच्छ।
अंत में सुविधानुसार कन्या के विदाई होइत ऐच्छ,जकरा द्विरागमन कहइत छि।
अहि पूरा आयोजन में गौर करई वाला बात ऐच्छ,समाज में परिवार के महत्व, परिवार अगर संस्कारी रहत त कन्या भी संस्कार वाली होयत,ऐता उपरी सुन्दरता स अधिक, सुन्दरसंस्कार के देखल जाईत ऐच्छ कियाकि स्त्रीये परिवार के संस्कार देइत छैथ।
मिथिलांचल में महिला के काफी महत्व देल जाइत ऐच्छ।

मैथिल विवाह के मूल स्वरूप इहे ऐच्छ। हाँ आब लोक अपन सुविधानुसार फेर बदल क क विवाह संपन्न करवावेत छैथ।

जय मिथिला।

:-अमित मिश्रा