छठ पूजा

*छठ पूजा*
यूं तो छठ पूजा का नाम आते ही केवल इसे बिहार वाशियों से जोड़ा जाता है,लेकिन केहते है ना आस्था पे कोई प्रतिबंध नही होता और इसीलिए आजकल ये आस्था का पर्व आपको भिन्न भिन्न प्रान्त के लोगो द्वारा भी करते हुए दिख जाएगा।
ये हम सबके लिए एक विशेष क्षण होता है ,अब हो भी क्यों ना हमारा सबसे बड़का पर्व होता है भाई,यही तो मौका होता है कि जो गांव पूरा का पूरा खाली रहता है पूरे साल वो चकमक करते हुए लोगों से भर जाता है।
सबसे पहले तो ई कह दूं कि अगर आप भी हमारे जैसे बाहर रहते है गांव से तो सम्भल जाए क्योंकि यही एक मौका होता हमें लूटने का,अब करे भी क्या वो बिहारी कह के हमे लूटते है और हम भी वहाँ समझदार होते हुए कुछो नही कर सकते काहे की सवाल आस्था का है ना और जाना तो है ही और सरकार तो हमारा कब सुनी है जो अब सुनेगी, यूं तो ट्रैन की टिकट उपलब्ध नही होती लेकिन जितना ज्यादा आप पैसा फेकेंगे उतना ही आपको ज्यादा मौका मिलेगा सीट पाने का और तो और 3महीना पहिले से हवाईयो जहाज का ‘भाड़ा मतलब की फेयर’ बहुते बढ़ जाता है मानो की वो भी इंतेज़ार में होते हैं।खैर सिस्टम पे बोलने लगे तो और कुछो नही लिख पाएंगे,और करे भी क्या हम बिहार वाले है ना सब हमको बकलोल बोल के चुप कराने के कोशिश में ही होते हैं।
और जो लोग हम जैसे इस महापर्व में भी अपने घर नही जा पाते वो बीते सालों के अनुभव को ऐसे याद करते है…👇👇
बात करें छठ पूजा की तो दीवाली खत्म होते ही इसकी तैयारियां शुरू हो जाती है,चार दिनों का ये पर्व दीवाली के चौथे दिन नहाय-खाय से शरू होता है इस दिन व्रती (खास तौर पर महिला साथ ही बहुत सारे पुरुष) स्नान करके फिर शुद्ध,सात्विक (विशेषतः घी से बना और कद्दू की सब्जी)खाना खाते है और ऐसे शुरूआत होती है इस महापर्व की।
दूसरे दिन यानी कि दीवाली के पांचवे दिन खरना(खीर-रोटी) इस दिन व्रती पूरे दिन बिना अन्न और जल के रहते है और सांझ के समय खीर-रोटी बना कर पूजा करने के उपरांत उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते है और इसे ही खरना कहा जाता है।इसके बाद पारण तक व्रती ना कुछ खाते है और ना कुछ पीते मतलब की उनका निर्जला व्रत शुरू हो जाता है,साथ ही व्रती जल और अन्न के साथ शैय्या का भी त्याग करते है सोने के लिए केवल कंबल का उपयोग करते है।
तीसरे दिन यानी कि दीवाली के छठे दिन घर के बड़े खाली पैर ढाकी लेके पोखैर, नदी के किनारे जाते हैं जहाँ व्रतियों के द्वारा डूबते हुए सूरज को अर्घ दिया जाता है,अर्घ कोनिया में फल,नारियल,कुशियार, ठकुआ,भुशुआ सब लेके दिया जाता है।महिला और परुष इसमे निखण्ड सारी और धोती का प्रयोग करते है जो कि विशेषतः पियर या भगवा रंग का होता है।फिर डूबते सूरज को अर्घ देने के बाद व्रती कपड़ा बदल कर घर आ जाते है और घर के बड़े चच्चा,पप्पा ढाकी उठा के घर के तरफ आ जाते है और हमे क्या हम तो बस मुरही,कचरी,लिट्टी,समोसा ये सब खा लेते है और घर के लिए भी ले लेते है क्योंकि कोन त्योहार में घर का खाना चाहता है।
चौथे दिन भोरे भोर मतलब बूझिये तो उस दिन सोता कोन है जैसे ही कोई चच्चा बाहर से आवाज दिए कि हम बच्चा पार्टी जाके सबको झूठो का बोल देते है कि सब चले गए टोल से,अब जल्दी जाके वहाँ छुरछुरी,मिरचइया ये सब फोड़ना होता है और साथ ही अपने संगी को भी तो वादा किये होते है कि तुमको हम उतने भीड़ में भो जरूर ढूंढ लेंगे,क्या करे टिनहीँ हीरो जे ठहरे।
खैर तो पापा, चाचा सब ढाकी लेके फिरसे पोखैर,नदी जाने लगते है और व्रती लोग भो उनके पीछे पीछे।
इस समय भोरे भोरे ऐसा ठंडा हवा लगता है कि क्या बताए जैकेट,स्विटर के अंदर ढुक के सट-सटा देता है।
फिर पोखैर पर पहुँचने के बाद वहां पप्पा-चच्चा सब ढाकी में से सब समान निकालने लगते है और हम फटक्का सब लेके निकल जाते है फोड़ने और उससे ज्यादा अपने संगी को दिखाना होता है कि हमारा फटक्का सबसे अच्छा है।
इस सब के बाद व्रती फिर से पानी मे खड़े हो जाते है और सूरज देव के उगने के इंतेज़ार करने लगते है और कहते है ना इंतेज़ार के समय वक़्त लंबा ही हो जाता और ऐसा ही तभी सबको लगता रहता है क्योंकि बहुते ठंडी लगते रहता है।
आखिरकार सूरज देव अपने समय पर निकलते है और व्रती लोग के आंख में लाल चमक दे देते है फिर व्रती उन्हें अर्घ देते है और प्रणाम करके आशीष,मनोकामना मांग के बाहर आ जाते है और कपड़े बदल लेते है।
और ऐसे ही आस्था का ये महापर्व इस रूप से सम्पन्न होता है और व्रती लगभग 40 घंटे के बाद कुछ ग्रहण करते हैं।
और हम तो पूरे दिन कुशियार का गर्दा उड़ा देते है।
ऊपर जितना कुछ लिखे है वो सब हमारा बिता हुआ क्षण है अब बहुते कुछ बदल गया होगा क्योंकि 7सालों से इस महापर्व में शामिल होने का सुख नही मिला है,जब मिलेगा तो अपडेट कर देंगे।
:-अमित मिश्रा